सार: प्रस्तुत शोध-पत्र “रामचरितमानस में वीर रस का सौन्दर्यशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: राम के चरित्र के संदर्भ में” भारतीय काव्यशास्त्र और आधुनिक मनोविज्ञान के अंतर्संबंध को उद्घाटित करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य रामचरितमानस में वीर रस की संरचना, उसकी सौन्दर्यात्मक योजना तथा राम के चरित्र में उसके मनोवैज्ञानिक आयामों का विश्लेषण करना है। भरतमुनि के रस-सिद्धांत के अनुसार वीर रस का स्थायी भाव ‘उत्साह’ है, जो विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से परिपक्व होकर रस की अनुभूति उत्पन्न करता है। तुलसीदास ने बालकाण्ड से लंकाकाण्ड तक राम के चरित्र में उत्साह, धैर्य, मर्यादा और नैतिक साहस का समन्वित रूप प्रस्तुत किया है, जिससे वीर रस की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति होती है। अध्ययन में यह प्रतिपादित किया गया है कि राम की वीरता केवल युद्धपरक पराक्रम तक सीमित नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण, वचन-पालन, नेतृत्व-क्षमता और भावनात्मक संतुलन से संबद्ध है। वनगमन, राक्षस-वध, सुग्रीव-मैत्री, लंका-विजय तथा रावण-वध जैसे प्रसंगों के माध्यम से उत्साह स्थायी भाव क्रमशः विकसित होकर सौन्दर्यात्मक परिपक्वता प्राप्त करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से राम आदर्श व्यक्तित्व-मॉडल के रूप में उभरते हैं, जिनमें नैतिक साहस, संकट-प्रबंधन, टीम-निर्माण और भावनात्मक नियंत्रण का संतुलित समन्वय है। तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में महाभारत के नायकों तथा आधुनिक नायक अवधारणा से भिन्न, राम का नायकत्व मूल्य-आधारित स्थिरता और मर्यादा पर आधारित है। इस प्रकार यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि रामचरितमानस में वीर रस केवल साहित्यिक अलंकरण नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना में निहित आदर्श मनुष्य की परिकल्पना का सौन्दर्यपूर्ण रूपायन है। राम की वीरता आवेग नहीं, बल्कि संयमित उत्साह है—यही उसका सौन्दर्यशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य है।
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DOI:
10.17148/IMRJR.2026.030211
[1] दयाशंकर, प्रो. दिग्विजय कुमार शर्मा, "रामचरितमानस में वीर रस का सौन्दर्यशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: राम के चरित्र के संदर्भ में," International Multidisciplinary Research Journal Reviews (IMRJR), 2026, DOI 10.17148/IMRJR.2026.030211
