सार: मैत्रेयी पुष्पा के कथासाहित्य में विद्रोह के प्रच्छन्न स्वरों और स्त्री-अस्मिता के बहुआयामी स्वरूप का विश्लेषण करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि पुष्पा के यहाँ “विद्रोह” किसी प्रत्यक्ष, घोषणात्मक या नारेबाज़ रूप में नहीं, बल्कि जीवनानुभवों से उपजे सूक्ष्म, अंतर्निहित और प्रच्छन्न स्वरूप में अभिव्यक्त होता है। उनकी रचनाओं में स्त्री केवल पीड़िता नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं के भीतर अपने लिए अर्थ, गरिमा और अधिकार गढ़ने वाली सक्रिय कर्ता के रूप में उभरती है। शोध में यह प्रतिपादित किया गया है कि मैत्रेयी पुष्पा की स्त्री-अस्मिता देह, इच्छा, श्रम, आर्थिक स्वावलंबन, भाषा, लोकसंस्कृति तथा जाति-वर्गीय संरचनाओं के संदर्भ में निर्मित होती है। देह-राजनीति और इच्छा का प्रश्न उनके साहित्य में प्रतिरोध का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है, जहाँ स्त्री अपने अनुभवों को भाषा देकर सामाजिक ‘लज्जा’ और नैतिकता की दीवारों को चुनौती देती है। श्रम और आर्थिक निर्भरता के प्रश्न के माध्यम से लेखिका घरेलू कार्य की अदृश्यता तथा संसाधनों पर पुरुष-सत्ता के नियंत्रण को उजागर करती हैं। साथ ही, ग्रामीण यथार्थ, जाति-व्यवस्था और पंचायत-न्याय जैसी सामाजिक शक्तियों के बीच स्त्री का संघर्ष बहुस्तरीय रूप ग्रहण करता है, जिससे स्त्री-अस्मिता केवल लैंगिक विमर्श तक सीमित न रहकर सामाजिक न्याय की व्यापक मांग से जुड़ जाती है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मैत्रेयी पुष्पा की कथा-रणनीतियाँ जैसे विडंबना, दैनिक जीवन का सूक्ष्म चित्रण और स्त्री-दृष्टि को नैतिक केंद्र बनाना प्रतिरोध को “छिपाकर” उजागर करने की कलात्मक प्रक्रिया अपनाती हैं। लोकभाषा, कहावतों और बोलियों का प्रयोग अभिजात भाषा-सत्ता के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध रचता है, जिससे स्त्री अपने अनुभव को अपनी भाषा में अभिव्यक्त कर पाती है। अंततः यह निष्कर्ष सामने आता है कि मैत्रेयी पुष्पा का कथासाहित्य स्त्री को “विषय” से “कर्ता” बनाने की प्रक्रिया का सशक्त उदाहरण है। उनका प्रच्छन्न विद्रोह जीवन की रोज़मर्रा की स्थितियों में निहित है, जो धीरे-धीरे सामाजिक संरचनाओं की जड़ों को चुनौती देता है। इस प्रकार उनका साहित्य स्त्री-अस्मिता को आत्मसम्मान, स्वायत्तता और सामाजिक पुनर्संरचना के व्यापक विमर्श से जोड़ते हुए समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान स्थापित करता है।


Download: PDF | DOI: 10.17148/IMRJR.2026.030306

Cite:

[1] संजूबाला, प्रो. दिग्विजय कुमार शर्मा, "मैत्रेयी पुष्पा के कथासाहित्य में विद्रोह के प्रच्छन्न स्वर और स्त्री अस्मिता," International Multidisciplinary Research Journal Reviews (IMRJR), 2026, DOI 10.17148/IMRJR.2026.030306